Gwalior 

पहली बार टूटी रियासत की परंपरा, सिंधिया ने दशहरे पर प्रजा को नहीं बांटा सोना

ग्वालियर. सिंधिया रियासत के मौजूदा वारिस ज्योतिरादित्य इस बार राजवंश की सदियों पुरानी परंपरा को पूरा नहीं कर सके। वो बीती रात दशहर के उपलक्ष्य में जनता के बीच शमी पूजन कर स्वर्ण मुद्राओं के प्रतीक के तौर पर शमी पत्रों को बांटने नहीं पहुंच सके। दिन में वह खानदानी देवघर में दशहरे की पूजा करने पहुंचे, लेकिन देर रात फेमिली के साथ रामलीला आरती के बाद अचानक GT Express ट्रेन से दिल्ली रवाना हो गए।
ये परंपरा निभाने इस बार नहीं पहुंचे ज्योतिरादित्य….
 कई पीढ़ियों से सिंधिया राजवंश की परंपरा के तहत शाही पोशाक पहन गोरखी परिसर में कुलदेवता के मंदिर में पूजा के बाद सिंधिया अपने खास मराठा सरदारों के साथ कुलदेवी मांढरे की माता मंदिर पहुंच कर आशीर्वाद लेते हैं। इसके बाद मंदिर परिसर में ही एक शमी वृक्ष की पूजा कर मराठा सरदारों, उनकी फैमिली और मौजूद नागरिकों को शमी पत्रों का सोने के प्रतीक के रूप में दान देते हैं।
– इस बार ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शनिवार को दिन में दशहरा पूजन की सारी परंपराएं निभाईं शाम को पारंपरिक शाही पोशाक में देवघर भी पहुंचे। शाही ताजिए की सेहराबंदी भी की, इसके बाद बेटी अनन्या राजे व पत्नी प्रियदर्शनी राजे के साथ रामलीला भी पहुंचे।
– इससे पहले पिता माधवराव सिंधिया की पुण्य तिथि पर उनकी छत्री पर श्रृद्धांजलि देने भी पहुंचे। इस बार दशहरे के दिन ही उनके पिता की पुण्य तिथि भी थी, माना जा रहा था कि शायद इसीलिए ज्योतिरादित्य शमी पूजन और दान के लिए नहीं पहुंचे।
– अचानक देर रात ज्योतिरादित्य ट्रेन से दिल्ली रवाना हो गए. राजवंश से जुड़े सूत्रों ने बताया कि उनके किसी परिजन की तबियत अचानक नासाज होने की वजह से वह दिल्ली रवाना हो गए।
– हालांकि शमी पूजन और स्वर्ण दान की सदियों पुरानी परंपरा टूट गई, लेकिन उनसे जुड़े लोग कोई निश्चित वजह भी बता नहीं पा रहे।

ये है शमी पूजा की परंपरा
– दशहरे की शाम ज्योतिरादित्य मांढरे की माता मंदिर में कुलदेवी का आशीर्वाद लेकर शमी पूजन करते हैं। पूजा के बाद आमजन और मराठा सरदारों के बीच स्वर्ण मोहरें के तौर पर शमी के पत्ते लुटाते हैं।
-पूजा में ज्योतिरादित्य सिंधिया तलवार से शमी वृक्ष के पत्तों को तलवार से छूते हैं और फिर लोग उसके पत्तों को लूटने के लिए टूट पड़ते हैं। दानवीर राजा बलि के दान के प्रतीक के तौर पर सिंधिया राजवंश इस परंपरा का निर्वाह करता आ रहा है।

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