पाकिस्तान की शीर्ष अदालत ने भले 44 साल बाद ही सही, लेकिन मान लिया कि जुल्फिकार अली भुट्टो को दी गई फांसी में उचित न्यायिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ था। लेकिन सेना की जिस तानाशाही की वजह से ऐसा हुआ, वह आज भी पाकिस्तान की राजनीति पर हावी है

किस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में काली सलवार-कमीज और काले कोट पहने खड़े थे। उनकी कोट की जेब में विशुद्ध सिंधी रंगों वाला एक प्रिंटेड रूमाल था। विलावल अपनी कानूनी टीम के साथ पा ‘दिवंगत नाना यानी पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के मामले में फैसले का इंतज़ार कर रहे थे। यह अदालत की लाइव कार्यवाही थी और पाकिस्तान समेत दुनिया भर के लोग इसे देख रहे थे। प्रधान न्यायाधीश ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए कहा, ‘जुल्फिकार अली भुट्टो के मामले की निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई और न ME C ही संविधान की उचित न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया गया। लाहौर उच्च न्यायालय द्वारा मुकदमे की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट में अपील की कार्यवाही के दौरान निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार और संविधान के अनुच्छेद्र 4 एवं 9 में निहित उचित प्रक्रिया को पूरा नहीं किया गया, जबकि संविधान के अनुच्छेद 10ए में उचित प्रकिया के तहत एक अलग और मौलिक अधिकार के रूप में निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी दी गई है।

फैसला सुनते ही बिलावल रो पड़े और जेब से रूमाल निकालकर अपने आंसू पोछे। उनकी टीम के सदस्यों और समर्थकों की आंखों में भी आंसू थे। बाद में मीडिया से बात करते हुए उनकी आवाज कांप रही थी। जब उनकी मां बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गई थी, तब भी मैंने छोटे से बिलावल को सार्वजनिक रूप से रोते हुए नहीं देखा था। अब बिलावल बड़े हो गए हैं और पीपीपी के अध्यक्ष हैं। वह न केवल अपने नाना, बल्कि पीपीपी के पहले अध्यक्ष जुल्फिकार अली भुट्टो के मामले की सुनवाई देख रहे थे। मैंने हमेशा कहा है कि सैन्य तानाशाह और भ्रष्ट व अनैतिक सुप्रीम कोर्ट द्वारा जुल्फिकार अली भुट्टो को दी गई फांसी एक ‘न्यायिक हत्या’ थी। जैसा कि किसी ने टिप्पणी की कि इतिहास ने पहले ही जुल्फिकार अली भुट्टो को दोषमुक्त कर दिया है। भुट्टो के मुकदमे की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ताजा रुख स्वागतयोग्य है। लेकिन शीर्ष अदालत को अपनी नाक के नीचे होने वाली सुनवाई की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना चाहिए। देर से न्याय होना न्याय नहीं होने के समान है।

सुप्रीम कोर्ट ने जब भुट्टो को फांसी देने का फैसला सुनाया था, तब बिलावल का जन्म भी नहीं हुआ था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला आसिफ अली जरदारी द्वारा भुट्टो की फांसी के खिलाफ 2011 में दायर मुकदमे के संदर्भ में था। इस ताजे ऐतिहासिक फैसले की पृष्ठभूमि यह है कि वर्ष 2011 में राष्ट्रपति रहते हुए आसिफ अली जरदारी ने संविधान के अनुच्छेद 186 के तहत भुट्टो की मौत के फैसले पर फिर से विचार करने के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट के इस ताज़ा फैसले का अनेक राजनेताओं एवं वकीलों ने स्वागत करते हुए इसे ‘ऐतिहासिक’ बताया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा, ‘इतिहास की गलतियों को सुधारना मुमकिन तो नहीं है, लेकिन उस गंभीर गलती को स्वीकार करना नया इतिहास है और इससे नई परंपरा स्थापित हुई है। उन्होंने आगे कहा कि पिछली गलतियों को सुधारकर और दुश्मनी को खत्म करके ही राष्ट्रीय एकता और विकास को बढ़ाया जा सकता है।’ • इस बीच बिलावल की बहन आसिफा भुट्टो ने कहा कि आखिर भुट्टो की ‘न्यायिक हत्या’ के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई से वंचित कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि उनकी न्यायिक हत्या के 44 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया कि शहीद जुल्फिकार अली भुट्टो, जो मुल्क के लिए एक बड़ी उम्मीद थे, को एक क्रूर एवं षड्यंत्रकारी तानाशाह द्वारा इस दुनिया से खत्म कर दिया गया। आसिफा बेनजीर भुट्टो की सबसे छोटी संतान हैं और हाल ही में एक दूसरे कारण से चर्चा में थीं। उनके पिता आसिफ अली जरदारी और भाई बिलावल भुट्टो हाल में हुए चुनाव में सिंध से दो सीटों से चुनाव लड़े थे और दोनों सीटों पर जीत गए। उम्मीद है कि उनमें से एक सीट खाली होने के बाद आसिफा वहां से चुनाव लड़कर सांसद बनेंगी। यह एक अनूठी बात होगी कि जरदारी, बिलावल एवं आसिफा एकसाथ निचली सदन में उपस्थित होंगे। मुल्क के इतिहास में ऐसी कोई मिसाल नहीं है, जब कोई पिता और उनकी दो संतान एक ही समय में सांसद हों। आसिफा भुट्टो ने आगे कहा, ‘शीर्ष, अदालत के ताजा फैसले ने जुल्फिकार अली भुट्टो को सही साबित किया है। मैं शहीद मोहतरमा बेनजीर भुट्टो के लिए सिर्फ दुआ कर सकती हूं, जिन्होंने जीवन भर अपने पिता की बेगुनाही साबित करने के लिए अथक संघर्ष किया। चार दशकों के बाद आखिरकार न्याय की जीत वं हुई है।’ जुल्फिकार भुट्टो की दूसरी नातिन फातिमा भुट्टो, जो प्रसिद्ध लेखिका हैं, ने कहा, ‘यह पाकिस्तान के पहले लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री के खिलाफ किया गया ऐतिहासिक अन्याय था। हम अदालत के सर्वसम्मत फैसले

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का स्वागत करते हैं और दुआ करते हैं कि ऐसा अन्याय दोबारा कभी न दोहराया जाए।’ लेकिन वकील हसन ए नियाजी ने जो कहा, वह पाकिस्तान, सुप्रीम कोर्ट और नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है- यह मानना कि जेडए भुट्टो को निष्पक्ष सुनवाई से वंचित रखा गया, एक स्वागतयोग्य निर्णय है, लेकिन जिन संरचनात्मक मुद्दों ने ऐसा घोर अन्याय होने दिया, वे पाकिस्तान की राजनीतिक और कानूनी व्यवस्था का हिस्सा बने हुए हैं। एक निर्दोष राजनेता को एक ताकतवर सैन्य तानाशाह और उससे प्रभावित अदालत ने फांसी पर लटका दिया। इसी वजह से प्रधान न्यायाधीश ईसा ने टिप्पणी की कि हमारे न्यायिक इतिहास में कुछ ऐसे मामले हैं, जिन्होंने लोगों को मन में यह धारणा बनाई है कि या तो भय या पक्षपात ने कानूनी ढंग से न्याय देने की प्रक्रिया को बाधित किया है। इसलिए हमें आत्म-जिम्मेदारी की भावना से, विनम्रता के साथ अपनी पिछली गलतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए, और यह सुनिश्चित करने की हमारी प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में कानून के प्रति अटूट निष्ठा के साथ न्याय दिया जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि जब तक हम अपनी पिछली गलतियों को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक खुद को सुधार नहीं सकते और न ही सही दिशा में आगे बढ़ सकते हैं

By Snews

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